Monday, January 31, 2011

कुछ नहीं...


       (1)
पानी के भीतर
एक बुलबुला सा
कुछ होकर भी
कुछ नहीं...

जानता हूँ
सतह पर आकर
टूट जाऊँगा,
पर भीतर भी तो

कुछ नहीं था,
अब भी

कुछ नहीं...


(2)


ये 'कुछ नहीं' होना भी तो
एक होना ही है
या यूँ कहूँ -
सिर्फ होना...

और कितना आनंद है
सिर्फ होने में...
या फिर 
'कुछ नहीं' होने में...

Thursday, January 20, 2011

चुप्पी ...


काश ! किसी दिन
ऐसा होता...
तुम चुप होती
मैं चुप होता...
हर तरफ़
चुप्पी का पहरा होता...

बातें होती
टुकड़ों  में,
पलकों के किनारों से
ख़ामोशी से...
चुपचाप...

तुम्हारी आँखें कुछ कहती
कहती रहती...
मेरी खामोशियाँ उन्हें सुनती
बस सुनती रहती...

ख़ामोशी से...
चुपचाप...

-कुंदन