Tuesday, March 15, 2011

एक पंख वाली गोरैया...



Under the house eaves the baby
sparrow chirping
As they beg for food in their untidy
nest of hay
Near human dwellings they are
quite familiar
They never cease to chirp all
through the day...


- Francis Duggan




सफ़ेद पंख, सर पे भूरी-भूरी धारियां ,छोटी सी आँखें, चोंच इतनी छोटी की बस एक बार में एक ही दाना खा सके...गोरैया ही तो कहते हैं... Sparrow ...पर वो तो गोरैया ही बोलता आया है ...

छोटा था तब ...जब गाँव में उसके घर की छत से लगे तख्तें उसके घोंसलों से भरे रहते ...House Within A House... दिन भर चीं-चीं करते घोंसलों में बच्चे...उसे सब कुछ याद है...
एक दिन जब एक घोंसला फर्श पर गिर गया था ...उसने देखा था... घोंसले में गोरैया के छोटे-छोटे बच्चे...लाल लाल से...उसे उस रात सपना भी तो आया था ...एक पंख वाली गोरैया का...और जब सुबह उसने घर में बताया था तो सब हंस परे थे.

उसे सब कुछ याद है...अँधेरा होते हीं जब देवता-घर में साँझ दिखने की बेला हो जाती तो वें घर के आँगन के चारो ओर गोल-गोल चक्कर लगाने लगती. और कभी-कभी जब उसके सर के ठीक ऊपर से वो उड़ जाती तो उसे चिढ होती ...वो मारने दौड़ता ...तो उसकी दादी मना कर देती ...ऐ मत मार...आज भी याद है ...
दादी कहती थी ...जिस घर में गोरैया का वास होता है उस घर में प्यार बसता है ...खुशियां होती है. 

सच ही तो कहती थी दादी... कितना अच्छा लगता था बचपन में...अक्सर जब उसे बुखार हो जाया करता था तो घर की देहरी पर पड़ी खाट पे पड़ा-पड़ा बड़े ध्यान से देखा करता...बघवा-चिड़ियाँ और गोरैया अलग-अलग होती है...उसकी दादी उसके तलवों को कपड़े से सहलाती रहती और वे झुण्ड बना कर उड़ती रहती...देहरी के ऊपर चारो तरफ ...बहुत अच्छा लगता था उसे...

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एक पंख वाली गोरैया...
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वर्षों बाद वो गाँव आया है ...
अब तो ना दादी रही ...
ना ही देहरी पे गोरैया...
ना ही उसका बचपन...

सच कहती थी दादी ..."जिस घर में गोरैया रहती है ...उस घर में ..........................".



-कुंदन 

(20th March is the World Sparrow Day)...

1 comment:

  1. सचकहूँ , तो भीतर महसूस किया मैने, कोई ज़ंजीरों से अभी-अभी आज़ाद हुआ...कोई टुकरा अभिन्न सा लगता है.. और कोई निस्छ्लआकृति ने अभी अभी मुझे भिगोया है ...गौरेयो के पंखों से

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