
कुछ फिल्मे दिन बना देती हैं। सुबह-सुबह 70 किमी की दूरी तय कर एक दोस्त के साथ रोहतक गया था गैंग्स ऑफ़ वासेपुर देखने। पान सिंह तोमर देखने के बाद से बस इसी फिल्म का इंतजार कर रहा था।
और फिर भरपेट पिज्ज़ा खा कर शुरुआत हुई वासेपुर के कहानी की ...
ये फिल्म कई मायनों में अलग है। बॉलीवुड का सिनेमा अब चम्बल और बिहडों से होता हुआ बिहार के कोयला खदानों तक पहुँच चूका है। धनबाद के वासेपुर जैसे गाँव तक...ऐसी कई कहानियाँ हैं जो किसी अनुराग कश्यप या तिग्मांशु धुलिया के इंतजार में थी।
गैंग्स ऑफ़ वासेपुर एक आंचलिक फिल्म है। रेणु के मैला आँचल की तरह...एक अंचल विशेष की कहानी। कहीं कुछ साबित करने की कोशिश नहीं की गई है। एक अंचल की पृष्ठभूमि में ही समाज की बदलती हुई तस्वीर दिखाई गई है। यहाँ नेहरु के tryst with destiny के लिए भी उतनी ही जगह है तो कुरैशियों को साथ मिलाकर चलने वाली मुसलामानों की राजनीति भी। अमिताभ का दौर भी है...और जंजीर में पुलिस बने अमिताभ दीवार में गुंडे क्यों बने, ये भी rationalized है। समय के साथ करवट लेते समाज की कहानी 1941 से 1990 के काल में कह दी गई है। घर में आया नगमा का फ्रिज consumerism का प्रतीक है तो टीवी पर चलता हुआ सास बहु का सीरियल बदलते हुए
दौर को दिखता है।
पियूष मिश्रा के पहले ही डाइलोग ने ओमकारा की याद दिला दी.... " बेवकूफ और चूतिये में धागे भर का फरक होता है ..."
चार साल सिंदरी में रहते हुए साइकल पर होती कोयले की लीगल चोरी तो रोज देखता था। वासेपुर कभी गया नहीं था लेकिन धनबाद के पुराना बाज़ार और वासेपुर में ज्यादा फर्क नहीं दिखा। वासेपुर के लोग जाने पहचाने से दिखे...कोयले से सनी मिटटी और दामोदर नदी...धनबाद स्टेशन पर झरिया,गिरिडीह,बोकारो कहता हुआ शाहिद खान। हाँ ...अब बैलगाड़ी और टमटम की जगह टेकड़ ने ले ली है।
मनोज वाजपेयी के दबंगई और गुंडई वाले कई फिल्मे देख चूका हूँ... सत्या, शूल और लंका जैसी फ़िल्में ...लेकिन इस फिल्म में कुछ ऐसे रंग दिखे जो पहले कभी नहीं देखे थे। एक मक्कार इंसान का किरदार ..नगमा और दुर्गा के बीच का मनोज वाजपेयी। कुँए पर दुर्गा की ताल से ताल मिलाकर कपड़ा धोने वाला सीन हो या घर की सफाई करती हुई नगमा से बतियाता हुआ सरदार खान , विधायक को कूट कर जेल जाता हुआ या लुंगी उठा कर बम फेंकता हुआ सरदार खान...मनोज वाजपेयी बेहतरीन हैं। सरदार खान मनोज वाजपेयी को छोड़ कर कोई और नहीं हो सकता था। अनुराग कश्यप ने बहुत कोशिश की है कहानी को किरदारों से ऊपर रखने की लेकिन सरदार खान आगे निकल गया है। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर-I सरदार खान की फिल्म है।
तिग्मांशु धुलिया को पहली बार अभिनय करते हुए देख रहा था। हासिल और पान सिंह तोमर जैसी फ़िल्में classics हो चुकी हैं। रामधीर सिंह काफी संयत और संवेदनशील किरदार है। कहीं भी कोशिश करते हुए नहीं दिखे...एकदम natural और spontaneous ...कई और actor हैं, जिन्हें हम हम छोटे छोटे 10-15 सेकंडो वाले रोल में देखते आयें हैं, इस फिल्म ने उन्हें पूरा space दिया है। चाहे फैज़ल के रोल में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हों या फिर सुल्तान सब ने पूरे से थोड़ा ज्यादा किया है। सलाम-ए -इश्क वाले गाने में यशपाल शर्मा ने छाप छोड़ दिया है ...ये वही यशपाल शर्मा है जिसने गंगाजल में सुंदर यादव का रोल किया था। हजारों ख्वाहिशें ऐसी के "A friend in need is a friend indeed" वाले यशपाल शर्मा...
फिल्म का संगीत एकदम देशी है। वुमैनिया गाँव में शादी के गीत गाती औरतों की याद दिलाती है। मुजफ्फरपुर के दीपक और गया के सुजीत के नाम एल्बम के कवर पर हैं...जो इन्होने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा। पियूष मिश्रा का "इक बगल में चाँद होगा ..." यथार्थवादी सिनेमा का एक छायावादी गीत है।
ये फिल्म दर्शकों को भी चैलेंज करती है। detailing इतनी है शायद एक बार देखना कम पड़े पूरी तरह से absorb करने के लिए।फिल्म पूरी तरह से realistic है। सुल्तान के लिए अलग चीनी मिटटी के बर्तन में खाना देना हो या फिर हेरोइन का लिपस्टिक लगा कर सिनेमा हॉल में जाना...ट्रेन में बैठा वो अमिताभ का डुप्लिकेट...हेरोइन का permission के साथ हाथ छुना ...और ऐसे अनेकों सीन हैं ...सबकुछ पूरे से थोड़ा ज्यादा ...
ये पूरी तरह से बिहार की फिल्म है। भोजपुरी में कहे तो एकदम खांटी ... Linkin Park और Iron Maiden सुनने वाले Dudes और Bros को ये फिल्म शायद समझ में ना आये पर वे लोग जिनका गाँव से सरोकार है और जिन्होंने आज भी अपने देशीपन को बचा कर रखा है उनको ये फिल्म जरूर छुएगी ।
अंतिम सीन में गोली लगने के बाद गाड़ी से निकलता सरदार खान और background में बजता मनोज तिवारी का गाया "जिय हो बिहार के लाला ..." रोहतक के multiplex में बैठे एक बिहारी के रोएं खड़े कर जाता है।
अनुराग कश्यप ने कह कर लिया है।
--कुंदन
(फिल्म की review दूसरी बार लिख रहा हूँ और क्या coincidence है पहली वाली भी अनुराग कश्यप की ही फिल्म थी ...गुलाल )
अंतिम सीन में गोली लगने के बाद गाड़ी से निकलता सरदार खान और background में बजता मनोज तिवारी का गाया "जिय हो बिहार के लाला ..." रोहतक के multiplex में बैठे एक बिहारी के रोएं खड़े कर जाता है।
अनुराग कश्यप ने कह कर लिया है।
--कुंदन
(फिल्म की review दूसरी बार लिख रहा हूँ और क्या coincidence है पहली वाली भी अनुराग कश्यप की ही फिल्म थी ...गुलाल )
It was nice to read this....
ReplyDeleteThanks Shwetank...
ReplyDeleteवाह कुंदन भाई ... बहुत अच्छा विश्लेषण किया है.... दिल खुश हो गया... बहुत दिनों बाद कुछ इतना अच्छा पढने को मिला... उम्मीद है आगे भी आपके ब्लॉग नियमित रूप से पढने को मिलेंगे..
ReplyDeleteधन्यवाद पड़्कज बाबू
Deleteसमकालीन परिवेश और जीवंत मनोभावों का उपयोग आपके ब्लॉग की विशेषता है.हिंदी लेखन में आप जैसे लोग रूचि लेते रहेंगे तो पाठक पढने को विवश हो जायेंगे.मैं पंकज जोशी जी की वजह से आपसे परिचित हुआ.उनको और आपको मेरी शुभेच्छाएं.
ReplyDeleteThanks
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