Saturday, October 1, 2011

मोनालिसा

आज फिर रात आयी है
हमेशा की तरह 
आज फिर थक गया हूँ...

दुनिया कहती है 
ज़िन्दगी को  चित्रकथा बनाओ 
लोगो को आसानी होती है ना पढने में !
और तस्वीर की मुस्कुराहट
थोड़ी लम्बी होनी चाहिए 
थोड़ी रहस्यमयी भी
मोनालिसा की तरह...

मैं थक जाता हूँ
मुस्कुराहटो के बोझों से...

कई बार सुना था-
ज़िन्दगी खुली किताब नहीं होनी चाहिए 
क्या करूं-
ज़िल्द चढ़ाना नहीं जानता...

मैं थक जाता हूँ...

और फिर 
हमेशा की तरह 
निकल पड़ता हूँ
ढूंढने सपनों में,
एक सादा सफ़ेद पन्ना 
और एक किताब
बिना ज़िल्द वाली...



- कुंदन 

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