शब्द तुम्हारी खामोशियों के...
आज भी सुनता हूँ तुम्हें
और तुम्हारी आहटों को
और तुम्हारी आहटों को
महसूस करता हूँ उस खुशबू को
जो कभी तुम्हारा एहसास कराती थी...
वर्षों बाद
जब आज गुजरा हूँ
देखता हूँ
पंचायत भवन की टूटी खिड़की
जिससे झांक रही थी कुछ परछाइयाँ...
मुझे देख रही थी...मानो आश्चर्य से
पीछे पलट कर देखता हूँ
शायद तुमने पुकारा हो...
ढूंढ़ रहा हूँ
इन्ही रास्तों पर
कागज़ के कुछ टुकड़े
जो गिराए गए होंगे
कभी शायद मेरे लिए...
वर्षों बीत गए हैं
पर वो कागज़ के कुछ टुकड़े
आज भी दबे हुए हैं
यहीं कहीं
इन्ही रास्तों पर
मानों मेरे अतीत के अवशेष हों
जिसके टुकड़े बिखरे पड़े हैं
इधर उधर
पेड़ से गिरे सूखे पत्तो की तरह
जहाँ हर पत्ती एक कहानी कहती है
तुम्हारी कहानी...
मेरी आँखों से...
-कुंदन

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